Submission 1774

ख्वाइश

Submitted By: Priti Choudhary

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दूर कहीं बादलों पर,हो बसेरा मेरा सारा जहां खोजता फ़िरु, कहूँ दिल परिंदा मेरा । मन कहता है, कही दूर चली जाऊ, फिर रोक देती हैं, कुछ मजबूरियाँ। एक सख्श जिसे अपने मन की बात कह देती थी, ना जाने कहा बादलों में जाकर छिप गया। मन की सारी बातें मन में रह गई, अब यह जिंदगी बहुत लंबी हो गई। जिंदगी की इस कशमकश के चलते, मैं बिना पंख का परिंदा बन गई। मशक्कत करके कुछ लिख पाई हूं आज, शिद्दत बीत गई मन को आबाद करने में। मज़ा जिन्दगी ए जिंदादिली में न रहा, समय बीतता गया प्रीतो, समय बर्बाद करने में।

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Reg ID: HF25-5099

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