अब औरत उड़ने लगी है
Submitted By: Dr Reshma M L
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डर यही तो है न...कि अब औरत ज़मीन पर नहीं रहती, वो अब सवाल नहीं, जवाब बनने लगी है। कभी रसोई की आग में सुलगती थी, आज वही लौ बनकर रोशनी दे रही है। कभी चुप थी, अब शब्दों में ज्वाला है, अब उसकी चुप्पी भी इंक़लाब कह रही है। डर इसलिए भी है...क्योंकि उसने झुकना छोड़ दिया है, हर बार “हाँ” कहने वाली, अब “क्यों?” बोल रही है। वो हाथ जो काँपते थे, अब दिशा दिखाते हैं, वो पाँव जो थमते थे, अब राह बनाते हैं। अब औरत ज़मीन पर नहीं,हर आसमान में अपनी जगह बना रही है। अब वो किसी की छाया नहीं -ख़ुद सूरज बन जल रही है।
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Reg ID: HF25-5400
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